Garbhwati Hathini Ki Kahani

Garbhwati Hathini Ki Kahani

गर्भवती हथिनी की कहानी / Real story of kerala

कुछ दिनों पहले की बात है एक हथिनी थी हथिनी के पेट में बच्चा था जो कुछ ही महीनो में जन्म लेन वाला था। चार दिन से भूखी हथिनी जंगल में इधर – उधर टहल रही थी गर्भ के कारन हथिनी अधिक भूखी थी इसलिए वह भोजन ढूंढते – ढूंढते एक गांव में पहुंच गई और वह पर गांव के रास्ते पर एक अननाश का फल मिला जिसे देख कर हथिनी बहुत खुश हो गयी और तुरंत हथिनी ने उस अनानाश को खा लिया जैसे ही हथिनी ने अनानाश को खाया वैसे ही अनानास हथिनी के मुँह में फट गया ,अनानास फटने के कारन हथिनी का मुँह जल गया और दर्द के कारन हथिनी चिल्ला रही थी दर्द से तड़प रही थी , हथिनी समझ नहीं पा रही थी की वो क्या करे उसे क्या मालूम जिस अनानास को उसने खाया था वह पटाको से भरा हुआ था जिसे किसी इंसान ने जंगली जानवरो को अपने खेत से भागने के लिए रक्खा था….

लेकिन उस हथिनी को क्या पता की एक फल में भी कोई बारूद रख सकता है वह तो भूख के वजह से उस फल को खा गयी इस वजह से हथिनी का पूरा मुँह जल गया और वह दर्द के मारे पागलो की तरह इधर – उधर भटक रही थी। हथिनी चाहती तो गुस्से के कारन गांव वालो को नुकसान पंहुचा सकती थी लेकिन उसने ऐसा नहीं किया वह दर्द के मारे कराह रही थी। पूरा मुँह जलने के कारन वह कुछ और खा नहीं पा रही थी इसलिए वह बहुत कमजोर होती चली गयी उसके पेट में बच्चे को भी सही तरीके से भोजन नहीं मिल पा रहा था गांव वाले उसका दर्द समझ रहे थे लेकिन कुछ कर नहीं सकते थे मुँह जलने के कारन उसके मुँह पर मक्खियाँ भी बैठने लगी थी उसे भूख और उसके पेट में पल रहे बच्चे के चिंता सताए जा रही थी और वह इस चिंता से राहत पाने के लिए पानी में चली गयी और तीन – चार दिनों तक पानी में ही बैठी रही।…

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गांव के लोगो ने और हाथियों की मदद से उस हथिनी को पानी से बहार निकालने की कोसिस की ऐ सोचकर की सायद वह दूसरे हाथियों को देखकर बाहर निकल आये और बच सके लेकिन हथिनी जान गयी थी की वह अब नहीं बचेगी उसका मरना तय है लेकिन वह जीना चाहती थी अपने लिए नहीं अपने बच्चे के लिए सायद ही ऐसी कोई माँ होगी जिसपर ऐसी कोई नौबत आयी हो बेचारी हथिनी ने स्वेच्छा से जल समाधी ले ली। ऐ जानते हुए भी की उसके पेट में एक बच्चा है जिसे वह इस दुनिया में लाना चाहती थी उसके साथ खेलना चाहती थी लेकिन वह ऐसा कर न सकी उसी वक़्त हथिनी ने दम थोड़ दिया। इस द्रस्य को देख कर बाकि हाथियों के आँखों में आँशु आ गए सायद एक बेजुबा का दर्द एक बेज़ुबा ही समझ सकता हो। एक इंसान के गलती की सजा बेचारी उस हथिनी और उसके बच्चे को मिली जिसकी कोई गलती भी नहीं थी ,एक तरफ हम उसे गणेश भगवन मानकर पूजते है दूसरी तरफ हम उसी हाथी से इतना गन्दा दुर्वव्हार क्यों।…

इंसान ये क्यों भूल गया की वो हथिनी एक माँ भी थी सायद ये बात उसे पता न हो लेकिन वो ये क्यों नहीं समझ पाया की वो भी एक बेजुबा जानवर है उसमे भी जान है। इंसान की इन्ही हरकतों को देख कर लगता है जो ये आपदाये महामारी है ये इन्ही गलतियों का परिणाम है। इंसान इतना स्वार्थी हो गया है की सायद वो भूल गया है की जितना हुक धरती पर उसका है उतना ही हुक अन्य जीवो का भी है। इंसान को कोई भी गलत कदम ( अन्य जानवरो या जीवो के प्रति ) उठाने से पहले ये सोच लेना चाहिए की यदि धरती पर अन्य जिव नहीं रहे तो हम भी ख़त्म हो जायेंगे क्यूंकि जितना अधिकार हमारा है धरती पर उतना ही अन्य जीवो का भी है। इसलिए हमे अपने साथ – साथ धरती के अन्य सभी जीवो का भी ध्यान रखना चाहिए। 

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